वासुदेव यज्ञ अर्थात कृष्ण यज्ञ प्रमुख रूप से पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है। मनु ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यह यज्ञ किया था, जिससे उन्हें दस पुत्र हुए। ऐसा उल्लेख भागवत में आया है। इस यज्ञ का विधान अतिप्राचीन है। पुत्र प्राप्ति हेतु वासुदेव यज्ञ इस प्रकार करना चाहिए।
शास्त्रों के मतानुसार कृष्णयज्ञ को विधिपूर्वक सम्पन्न करने के लिए जरूरी है कि यज्ञकर्ता उपवास और प्रायश्चित कर्म करें।
इसके बाद यज्ञकर्ता अपनी धर्मपत्नी सहित बंधु-बांधव, इष्ट-मित्रों के साथ सूर्यार्घ्य देकर शंख ध्वनि के साथ यज्ञमंडप के पश्चिम द्वार से प्रवेश करे।
तत्पश्चात् आचार्य दिग्रक्षण, मण्डपप्रोक्षण, वास्तुपूजन, मंडपपूजन, न्यासपूर्वक प्रधानपूजन, योगिनीपूजन, क्षेत्रपालपूजन, अरणिमंथन, पंचभूसंस्कार सहित अग्निस्थापन, कुशकण्डिका, ग्रहपूजन, आधार-आज्यभागत्याग, ग्रह हवन, न्यास तथा प्रधान देवता का पुरुषसूक्त के मंत्रों से पंडित या आचार्य द्वारा हवन कराएं।
मण्डप पूजन तथा प्रधान देवता की आहुति पूर्णाहुतिपर्यंत प्रत्येक दिन करें।
कृष्णयज्ञ- भगवान विष्णु के अवतार, सोलह कलाओं से पूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का यह याग पांच, सात, आठ या नौ दिन में संपन्न होता है। कृष्णयज्ञ में पुरुषसूक्त के सोलह मंत्रों से व कृष्ण सहस्रनामावली द्वारा हवन होता है। विष्णुयज्ञ के सदृश इसमें भी सोलह हजार आहुति होती है। इस यज्ञ में हवन सामग्री ग्यारह मन कही गई है। इस यज्ञ को सम्पन्न कराने के लिए सोलह या इक्कीस विद्वानों का आचार्य सहित वरण होता है।
कृष्णयज्ञ का मुहूर्त- चैत्र में अथवा फाल्गुन में या ज्येष्ठ मास में अथवा वैशाख मास में या फिर माघ मास में कृष्णयज्ञ किया जा सकता है। इन मासों में किया गया कृष्णयज्ञ शुभकारी होता है।
शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का यह यज्ञ त्रैवर्णिक कर सकते हैं।
संतान प्राप्ति हेतु यज्ञ, हवन करवाने के लिए आचार्य मुक्ति नारायण पांडे जी ( 7000121183) से संपर्क कर सकते है।